تمسك  بثوبها  المرقط ∙∙∙     لم  العجلة  أمي  ؟ !

 

 بائع  الحليب  سيغيب   لخمسة  أيام  أو أكثر ∙∙∙ والحجرة الوحيدة  في بيتنا  يحرسها  الذباب ∙∙∙  تمهلي ! ! لربع قرن فقط ٬

 

 الشق  في سقفنا   زاد  شبرين لا أكثر  ٬ وحبوب   الشعير   تكفي  لاطعام   سرب  طيور رويدك  أيتها  البهية  ! ! ولدك  الشقي  للجدار  البارد  أسند    ظهره ٬ يتعقب  أحلامه المجهضة أسفل أحذيتهم الوسخة ٬   يلوك  الخواء     ٬و يبلع   ريقه  .. عله  يخرس عصافير بطنه بربع   رئة ٬ دخن  كومة  أعقاب  سجائر ٬ وشرب قوارير الذل حد  الانتشاء.

 

قرة  عينك  ابتلعه  الشارع  ذات   انهزام ٬ سلبه انسانيته ٬ غدا  في  أعينهم  الوقحة  أحقر من أحقر ذبابة. اليوم .. ..  مد  يده ليتسول  كسرة  خبز٬ هرول بعدها ليستفرغ  ذاته  في  الزبالة

اه   منها  المدينة  أشبعته  وهما    مصت  دمه ..   قضمته   قطعة ..  قطعة.. ورمت هيكله للكلاب

استحال  مسخا ٬ يقتل  أيامه العفنة  في  الزوايا  المنسية .

الليلة  نصب   سريره  الكارتوني  فوق    التراب  ٬ دس  كفه  في  جيبه  المثقوب ٬ لف نفسه بأسمال مرقعة٬  و سرح  في  أحلامه - البعيدة  عن   الارض -  تسربل  طيف حبيبته( دون  اذن) شبك  أصبعها  بخاتم  ماسي  همست  له "أحبك" لأول مرة

 

   الصقيع  غدا  ماردا  يهب  من  كل  حدب٬ يجلد  أخر  جرعات  الصبر٬  ومدينة   الذئاب غارقة   في  سبات عظيم   من  يوقظها ؟  من  يكترث ؟

... اقتربي  أكثر  أمي  ... الشوارع   زرعت  الرعب  داخلي 

أنا  مرهق  جدا ...  عانقيني أمي  ... دعيني  أسند رأسي على  صدرك...  أتوق لأنفاسك الطاهرة  ... لمذاق  زيت  الزيتون  وخبز  الشعير  من  كفيك..   للماضي  الجميل  تحت  وسائدك..  .. لحكايا  الغول  .. الغول  الذي  ابتلعني ذات  زحام   .



لوحة رائعة